Jean Piaget’s Theory Of Cognitive Development in Hindi

जीन पियाजे का संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत

बालक के संज्ञानात्मक विकास का अध्ययन स्विट्ज़रलैंड के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक जीन पियाजे द्वारा किया गया है 22 वर्ष की उम्र में जूलॉजीमे पीएचडी उपाधि अर्जित करने के बाद उन्होंने जीव विज्ञान तथा ज्ञान प्राप्त करने के प्रक्रिया के बीच संबंध खोजने का प्रयास किया। उन्होंने जीव के बारे में जैसे:- जीव कैसे ज्ञान प्राप्त करता है का पूर्ण रूप से मानव्य संदर्भ में अध्ययन किया। पियाजे ने संज्ञानात्मक विकास के संदर्भ में अनेक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए। जैसे:- बच्चों में प्रतीकों का विकास कैसे हो जाता है? भाषा और विचार किस प्रकार संपर्क से हो जाता है? संज्ञानात्मक विकास की प्रक्रिया किस प्रकार विकसित होती है?

पियाजे संज्ञानात्मक विकास की व्याख्या करते हुए कहा है कि संज्ञान प्राणी का वह ज्ञान है जिसे व वातावरण के संपर्क में आने पर अर्जित करता है। इस प्रकार के ज्ञान में अनेक प्रकार की क्रियाएं सम्मिलित होती हैं।

संज्ञानात्मक विकास में सम्मिलित प्रक्रियाएं:-

    1. मन्तव्य (Schema)(स्कीमा) :- पियाजे ने उन व्यवहार के प्रतिमानो को स्कीमा कहां जो बालक भौतिक वस्तुओं के साथ-साथ अपने कार्यों में प्रयोग करते हैं। स्कीमा(schema) सरल हो सकते हैं जैसे कि बालक के व्यवहार का प्रतिमान जब वह जानता है की जो वस्तु उसके पहुंच में है उसे कैसे पकड़ा जा सकता है। स्कीमा जटिल भी हो सकता है जैसे की विद्यार्थी गणित की कठिन समस्याओं को हल करना सीखता है। स्कीमा व्यवहारिक तथा ज्ञानात्मक दोनों हो सकते हैं। वह व्यवहारिक उस समय है जब कार्य वस्तु को पकड़ने का अथवा साईकिल चलाने का है। वह ज्ञानात्मक उस समय हो सकता है जब कार्य समस्या हल्का अथवा अवधारणाओं को सीखने का है। शिशु वस्तुओं के बारे में उस स्कीमा के प्रयोग द्वारा सीखते हैं जो कि उन्हें स्वयं विकसित किए हैं ।
    2. आत्मसातकरण (Assimilation):- अवधारणा जिसका प्रयोग यादें किया है की आत्मसातकरण उस समय होता है जब बालक पहले सीखें गए स्कीमा का प्रयोग एक नई वस्तु पर करता है। जैसे:- स्कीमा दांत से काटना, पटकना, अथवा लुढ़कना हो सकता है। मूल रूप से आत्मसात करण एक नई वस्तु अथवा घटना को वर्तमान स्कीमा में सम्मिलित करने की प्रक्रिया है । किंतु यह आवश्यक है कि जिस वस्तु अथवा घटना का समावेश करना है वह प्रस्तुत स्कीमा में नियोजित हो सकती है जैसे एक छोटे बालक को यदि एक नई वस्तु जो उसने कभी नहीं देखी है किंतु जानी पहचानी वस्तुओं से मिलती-जुलती है तो वह उन schema को जो पहले विकसित कर लिया है जैसे पटकना काटना पकड़ना इत्यादि का प्रयोग करेगा।
    3. व्यवस्थापन (Accomodation):- व्यवस्थापन यह संदेश देता है कि वर्तमान स्कीमा में बदलाव करें ताकि वह नई वस्तुओं को अपने में सम्मिलित कर सके। अनेक बार वर्तमान स्कीमा कार्य में नहीं आ पाते हैं। जैसे:- यदि एक बालक को शीशे की बोतल दी जाती है और वह पुरानी स्कीमा के अनुसार उसे फर्श पर पटकता है तो बोतल टूट जाती है जबकि पत्थर फेंकने पर आवाज भी आती थी। इस प्रकार बालक आवाज सुनने के स्थान पर एक ऐसे परिणाम का सामना करेगा जिसकी उसे आशा नहीं थी (बोतल का टूटना)। इस दशा मैं बालक स्कीमा में परिवर्तन ला सकता है।
    4. समतोलन (Equilibrium) :- जब स्थापित स्कीमा पूर्ण रूप से नई स्थिति का संचालन नहीं कर सकती है तो पियाजे के अनुसार असंतुलन की स्थिति उत्पन्न हो जाती है जो कि क्या समझा गया और क्या प्रस्तुत हो गया के बीच होती है। ऐसी दशा में व्यक्ति असंतुलन को कम करने की चेष्टा करता है। ऐसा वह अपना अवधान( ध्यान) पूर्ण उत्तेजक पर केंद्रित करके जिन्होंने असंतुलन पैदा किया है और नई स्कीमा बनाकर करता है अथवा पुरानी स्कीमा में परिवर्तन उस सीमा तक लाता है जब तक कि असंतुलन दूर ना हो जाए। यह समतोलन लाने की प्रक्रिया कहीं जाती है।

संज्ञानात्मक विकास के स्तर:-

जीन पियाजे ने बालको के संज्ञानात्मक विकास व्याख्या करने के लिए चार अवस्था सिद्धांत का प्रतिपादन किया है। वे 4 अवस्थाएं निम्नलिखित हैं :-

1. संवेदी पेशीय अवस्था (0-2 वर्ष) Sensory motor stage):-

यह अवस्था जन्म के 2 साल तक होती है। इस अवस्था में शिशुओं में अन्य क्रियाओं के अलावा शारीरिक रूप से चीजों को इधर-उधर करना, वस्तुओं की पहचान करने की कोशिश करना, किसी चीज को पकड़ना और प्राय: उसे मुंह में डालकर अध्ययन करना आदि प्रमुख हैं। इसके अलावा संवेदनशील माध्यमों से ज्ञान प्राप्त करना तथा अन्य पेशियों की सहायता से ज्ञान प्राप्त करना है। तथा उसकी सहायता से प्रकट भी करते हैं। उस अवस्था में संज्ञानात्मक विकास निम्नलिखित 6 अवस्थाओं से होकर गुजरता है:-

  • प्रतिवर्त क्रियाओं का चरण – (0-1) महीने
  • प्राथमिक परिपत्र प्रतिक्रियाओं का चरण – (1-4) महीने
  • माध्यमिक परिपत्र प्रतिक्रियाओं का चरण – (4-8) महीने
  • प्रतिक्रियाओं के समन्वय का चरण – (8-12) महीने
  • तृतीयक परिपत्र प्रतिक्रियाएं – (12-18) महीने
  • समस्या-समाधान का चरण (18-24) महीने

(English translation)

  • Stage of reflex actions – (0-1) months
  • Stage of Primary circular reactions – (1-4) months
  • Stage of Secondary circular reactions – (4-8) months
  • Stage of Coordination of reactions – (8-12) months
  • Tertiary Circular reactions – (12-18) months
  • Stage of Problem-solving (18-24) months

2. पूर्व संक्रियात्मक अवस्था (Pre-Operational Stage)

पूर्व संक्रियात्मक अवस्था को दो भागों में बांटा गया है:-

  1. सम्प्रत्यात्मक अवध (2-4):- यह अवस्था 2 से 4 साल तक होती है। सम्प्रत्यात्मक अवस्था परिवर्तन की अवस्था है। इस अवस्था में प्रत्यय का निर्माण पूर्व के अनुभवों के आधार पर होता है। इसे प्रारंभिक अवस्था या elementary stage भी कहा जाता है। इस प्रारंभिक अवस्था मैं बालक नाम के द्वारा वस्तुओं को पहचानने लगता है। परंतु पहचानने मैं कभी-कभी त्रुटि भी करता है। जैसे- वह अपने पिता के उम्र के सभी पुरुषों को पिता समझने लगता है। इन प्रत्यय का निर्माण व अनुकरण के माध्यम से अपने से बड़ों के द्वारा सीखते हैं। तथा इस स्तर पर बालक की सोच इतनी काल्पनिक हो जाती है की वह सत्य के काफी दूर हो जाता है। इस प्रकार की स्थिति प्राय: खेलों में देखी जाती है।
  2. अन्तर्दर्शी अवधि (4-7):- यह अवधि 4 से 7 साल तक होती है। इस अवधि में बालकों का चिंतन एवं तर्क पहले से अधिक परिपक्व हो जाते हैं। जिसके परिणाम स्वरूप वह साधारण मानसिक प्रक्रियाएं जो जोड़, घटाओ, गुना, भाग आदि में सम्मिलित होती है। उन्हें व कर पाता है परंतु मानसिक प्रक्रियाओं के पीछे छुपे नियमों को वह नहीं समझ पाता। अन्तर्दर्शी चिंतन इस प्रकार एक ऐसा चिंतन होता है जिसमें कोई क्रमबद्ध तर्क नहीं होता है। पियाजे के अन्तर्दर्शी चिंतन का भी एक दोष बताया गया है और वह यह है कि इस उम्र के बालक को में पलटावी गुण नहीं होता है। जैसे बालक यह तो समझ सकता है की 2 x 2 = 4 हुआ परंतु 4 ÷ 2 = 2 कैसे हुआ यह नहीं समझ पाता है।

3. ठोस संक्रिया की अवस्था या पूर्व संक्रिया की अवस्था (7-12 वर्ष) [concrete operation or pre-operative phase]:-

यह अवस्था 7 साल से प्रारंभ होकर 12 साल तक चलती है। इस अवस्था की विशेषता यह है कि बालक ठोस वस्तुओं के आधार पर आसानी से मानसिक संक्रियाएं करके समस्या का समाधान कर लेता है। परंतु यदि उन वस्तुओं को ना दिखाकर उसे उसके बारे में शाब्दिक कथन तैयार कर ,यदि समस्या उपस्थित की जाती है तो वह ऐसे समस्याओं पर मानसिक संक्रियाएं कर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने पर असमर्थ रहते हैं। जैसे – यदि उन्हें 3 वस्तुएं A,B,C दी जाएं तो उन्हें देखकर वे आसानी से कह देंगे कि इनमें से कौन सा बड़ा है। परंतु शाब्दिक कथन में कहने पर वह उसके बारे में सही उत्तर नहीं दे पाते हैं।

इस अवस्था के बालकों में तीन महत्वपूर्ण संप्रत्यय विकसित हो जाता है:-

  • संरक्षण
  • संबंध
  • वर्गीकरण

इस अवस्था की एक विशेषता यह भी है कि इनमें पलटावी गुण आ जाता है। जैसे अब बालक यह समझने लगता है कि 2 x 2 = 4 हुआ तो 4 ÷ 2 = 2 होगा।

4. औपचारिक संक्रिया की अवस्था (Formal operational stage):-

यह अवस्था 11 साल से प्रारंभ होकर वयस्क अवस्था तक चलती है। इस अवस्था में किशोरों का चिंतन अधिक लचीला तथा प्रभावी होता है। उसके चिंतन में पूर्ण क्रमबद्धता आ जाती है। अब वे किसी समस्या का समाधान काल्पनिक रूप से सोचकर एवं चिंतन करके करने में सक्षम हो जाते हैं। इस अवस्था में समस्या के समाधान के लिए एकांश को ठोस रूप से उसके सामने उपस्थित होना अनिवार्य नहीं है। इस तरह किशोरों के चिंतन में वस्तुनिष्ठ तथा वास्तविकता की भूमिका बढ़ जाती है।

पियाजे के सिद्धांत शैक्षिक उपयोगिता (Educational implications of Piaget’s Theory of Cognitive Development):-

1. पियाजे ने अपनी सिद्धांत में शिक्षार्थी बालक की भूमिका को काफी सक्रिय एवं महत्वपूर्ण बताया है। इससे शिक्षकों को पाठ्यक्रम तैयार करते समय शिक्षार्थियों की आवश्यकता, प्रेरणा एवं अभिरुचि पर विशेष रूप से नजर रखकर तैयार करने में सुविधा होती है।

2. पियाजे का सिद्धांत स्पष्टत: यह बताता है यह बालकओ के जीववाद एवं आत्मकेंद्रित जैसे दोष उत्पन्न हो जाते हैं। इससे शिक्षक को अपने अध्यापन का कार्य ढंग से तैयार कर पाते हैं कि इस तरह के दोषों से शिक्षार्थी जल्द से जल्द विमुक्त हो जाते हैं।

3. पियाजे का सिद्धांत यह भी स्पष्ट संकेत देता है कि ठोस संक्रियात्मक अवस्था में बालको का संज्ञानात्मक विकास इस स्तर का हो जाता है कि वे संरक्षण संपन्न तथा वर्गीकरण से संबंधित समस्याओं का समाधान कर सकते हैं। अतः इस अवस्था में यानी 7 से 12 वर्ष की आयु यदि मे शिक्षक इन जटिल मानसिक संक्रियाएं को अधिक बढ़ा देता है तो इनसे उनके बौद्धिक विकास का स्तर काफी तेजी से बढ़ता है और शिक्षा के मूल उद्देश्य अथति एक ऐसा व्यक्तित्व पैदा करना जो संज्ञानात्मक, आविष्कारक तथा आलोचनात्मक हो, अपने आप में पूरा हो जाता है।

4. इस सिद्धांत से शिक्षकों में शूज उत्पन्न हुई है कि यदि किसी किशोर में औपचारिक संक्रियात्मक चिंतन के स्तर को बढ़ाना है तो उसे अधिक ऊंचे स्तर की शिक्षा देना अनिवार्य है। सिद्धांत में यह स्पष्ट रूप से बताया गया है कि शिक्षा के स्तर से बालक को का औपचारिक संक्रियात्मक चिंतन सीधे प्रभावित होता है।

5. पियाजे के संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत स्पष्ट रूप से शिक्षकों को निर्देश देता है कि वे शिक्षार्थियों को अपने कार्यों के माध्यम से एक नई समझ और सुझाव विकसित करने में मदद कर सकते हैं। इसका मतलब यह है कि शिक्षक को शिक्षार्थी की अत्यधिक मदद नहीं करनी चाहिए क्योंकि ऐसा करने से उनमें आत्म-रुचि जैसे गुण विकसित नहीं होते हैं जो संज्ञानात्मक विकास में एक बाधा साबित होते हैं।

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